साहित्य कहानी

बच्चों का मित्र
किसी नगर में एक सुखी परिवार रहता था। माता पिता और बच्चे आपस में मिलकर प्रेम से रहते और सब कार्य मिलकर करते थे। परन्तु इस परिवार में से एक लड़का बुरी संगति में पड़ गया और दिन-प्रतिदिन बुरे कार्य करने लगा। वह न तो अधिक समय घर में रहता और न ही किसी सम्बन्धी से बात ही करता था। उसकी इस दशा से उसके माता-पिता दु:खी रहते थे। एक दिन पिता ने उसे अपने पास बुलाया और प्रेमपूर्वक बात करते हुए उसे अच्छा लड़का बनने की शिक्षा दी। लड़का अपने पिता की शिक्षा और आज्ञा को प्राप्त करने के बाद भी बुरा ही बनता गया।

एक दिन उसने अपने घर को छोड़कर बहुत दूर चले जाने का निश्चय किया और रात को वह चुपके से निकल गया। उसने विचार किया कि अब मैं स्वतंत्र हूँ, अत: आनन्द से रहूँगा। इधर उसके घर के लोग उसके अचानक घर से चले जाने से अत्यधिक दु:खी थे। उसके पिता ने अपने पुत्र को ढूँढ निकालने के लिये बहुत पैसा खर्च किया परन्तु सब व्यर्थ हुआ। प्रतिदिन उसके भाई-बहन उसकी प्रतिक्षा में व्दार पर इस आशा से खड़े रहते थे कि उनका भाई लौट आएगा। घर से दूर होकर उसने चोरी करना, जुआ खेलना, शराब पीना और हर प्रकार के बुरे काम करना सीख लिया। एक दिन वह चोरी करते हुए पुलिस व्दारा रंगे हाथ पकड़ा गया। जाँच-पड़ताल के दौरान उसके घर पर भी इस अपराध की सूचना भेजी गयी। लड़के को न्यायालय में ले जाया गया। वहाँ वह हथकड़ियों में बँधा हुआ खड़ा था। न्यायाधीश ने निर्णय सुनाते हुए कहा…"या तो जुर्माना दो या फिर जेल में डाले जाओगे। एक बहुत बड़ा प्रश्न था कि कौन उसका जुर्माना भरने के लिये तैयार है। पूरा न्यायालय शान्त था। एकाएक न्यायालय के कोने में बैठे एक वृद्ध व्यक्ति ने पुकार कर कहा, "मैं इस लड़के का जुर्माना भरने के लिये तैयार हूँ। वह व्यक्ति न्यायाधीश के पास आया तथा उसने आँसूओं से भरी हुई आँखों से उस लड़के की ओर और फिर न्यायाधीश की ओर देखा। यह व्यक्ति उस लड़के का पिता था। जुर्माना भरकर वह अपने पुत्र के पास आया और प्यार से देखते हुए उसे न्यायालय से बाहर अपने घर ले गया।

क्या पृथ्वी पर केवल यही एक बुरा लड़का है? जी नहीं… उस पवित्र परमेश्वर के सम्मुख इस जगत में प्रत्येक व्यक्ति बुरा है। परमेश्वर के पवित्र वचन 'बाइबल' में लिखा है कि सबने पाप किया और परमेश्वर की महिमा से रहित है। शायद हम अपने माता-पिता और अपने मित्रों से अपने पापों को छिपा सकते है परन्तु हम परमेश्वर से नहीं छिपा सकते। वह हमारे ह्रदयों को देखता है और हमारे विचारों को जानता है। जो भी कार्य हमने आज तक किए हैं, चाहे वे भले हैं, या बुरे, उन सबका हिसाब परमेश्वर के पास है।

झूठ बोलना, धोखा देना, चोरी करना, माता-पिता और बड़ों की आज्ञा न मानना, घमण्ड करना, क्रोध करना आदि बुरे कार्य सब पाप हैं। परमेश्वर जो कि पवित्र है, जिसमें कोई भी पाप नहीं, वह पाप से प्रसन्न नहीं होता परन्तु पाप से घृणा करता है और इसका दण्ड भी देता है। क्या आप चाहेंगे कि कोई आपकी वस्तुएँ चुराए और आप के विषय में झूठ बोले? आप इसे कदापि सहन नहीं करेंगे। जिस प्रकार बुरे व्यक्तियों को जेल में डाला जाता है या उन्हें दण्ड दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार पापियों को परमेश्वर दण्ड देता है। हम किस प्रकार दण्ड से बच सकते हैं? केवल एक ही उपाय है। अभी आपने पढ़ा कि किस प्रकार से पिता ने जुर्माना भरकर अपने पुत्र को बचाया। इसी प्रकार पिता परमेश्वर ने हमको दण्ड से बचाने के लिये एक योजना बनाई और उसके पुत्र अर्थात् प्रभु यीशु मसीह ने इस योजना को जो मेरे और आपके लिये थी पूरा किया।

प्रभु यीशु मसीह जो सृष्टिकर्ता भी है, जिन्होंने आपको और मुझे बनाया, उन्होनें यही चाहा कि मनुष्य पवित्र रहे परन्तु जब परमेश्वर ने देखा कि मनुष्य पापी हो गया है तो परमेश्वर बहुत दु:खी हुआ क्योंकि वह हम सबसे प्रेम करता है, और इसी प्रेम के कारण परमेश्वर ने मनुष्यों को सीधे नरक में नहीं डाला, परन्तु स्वयं स्वर्ग को छोड़कर इस पृथ्वी पर आया। "बाइबल" में लिखा है कि परमेश्वर ने सम्पूर्ण जगत के लोगों से प्रेम किया और पापियों के उद्धार के निमित्त प्रभु यीशु मसीह के रूप में देह धारण करके इस प्रेम को प्रकट किया। प्रभु यीशु मसीह ने दुखियों को सहारा दिया, निराश लोगों को आशा दी, बच्चों को आशिष दी, बिमारों को चंगा किया, अन्धो को आँखें दी, गूंगों को बोलने की शक्ति दी। इस प्रकार प्रभु यीशु ने अपने स्वभाव में, कार्यों में, शब्दों में अपनी पवित्रता तथा अपने प्रेम को प्रकट किया, परन्तु फिर भी एक दिन दुश्मनों ने प्रभु पर झूठा आरोप लगाकर उन्हें पकड़ लिया और न्यायाधीश के पास ले गये कि उन्हें दण्ड दें। न्यायाधीश ने ध्यानपूर्वक सब बातों की पूछताछ व जाँच की और भीड़ से कहा,"मैं इसमें एक भी दोष नहीं पाता हूँ।" परन्तु क्रोधी भीड़ ने यह चुना कि वह क्रुस पर मारा जाए। प्रभु यीशु मसीह ने कहा "मैं अपना प्राण देता हूँ… कोई उसे मुझसे छीनता नहीं, वरन् मैं उसे आप ही देता हूँ मुझे उसे देने का भी अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है।" यह कथन जो यीशु मसीह ने साहस के साथ कहा, पूर्णत: सत्य है। परन्तु इसे सुनकर न्यायाधीश ने भी सिपाहियों को आज्ञा दे दी कि यीशु को कीलों से ठोक कर क्रूस पर लटकाएँ। प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु समस्त मानव जाति के लिये एक चुनौती है। प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर छ: घण्टे तक लटके रहे और फिर उन्होनें अपने प्राण त्याग दिए। प्रभु यीशु की मृत्यु भी संसार के पापियों के लिए एक मूल्य को पूर्णत: चुकाना है। उनकी मृत्यु इस बात को दिखाती है कि उन्होनें हमसे कितना प्रेम किया। मृत्यु के बाद प्रभु यीशु मसीह कबर में दफनाए गए परन्तु वे कबर में नहीं रहे। प्रभु यीशु मसीह को उनकी बनाई हुई धरती अपने वश में न रख सकी। प्रभु यीशु इन सब बंधनों को तोड़कर मृतकों में से तीसरे दिन जीवित हो गए। यदि प्रभु यीशु मसीह जीवित नहीं होते तो हमारे पास कोई भी आशा नहीं होती।

जी उठने के बाद चालीस दिन तक प्रभु यीशु मसीह इस पृथ्वी पर रहे और बहुतों को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दिए और उनसे बात भी की। एक दिन प्रभु अपने शिष्यों के साथ एक पहाड़ पर गए और वहाँ उन्होंने अपने शिष्यों को अन्तिम आज्ञा दी और उनसे कहा कि सारे जगत में जाकर हर जाति के लोगों को खुशी का समाचार सुनाओ ताकि लोग अपने पापों से बच जाएँ। यही कारण है कि यह शुभ संदेश आपके हाथों में है। सुसमाचार को अन्य लोगों तक पहुंचाने कि इस आज्ञा को देने के पश्चात प्रभु यीशु मसीह अपने शिष्यों तथा अन्य लोगों के देखते-देखते स्वर्ग की ओर उठा लिये गए और बादलों ने उन्हें आँखों से ही छिपा लिया।

यही प्रभु आपके मित्र बनना चाहते हैं। आप यह न सोचे कि मैं छोटा हूँ इसलिए पता नहीं प्रभु मेरे दु:खो और संकटों से मुझे छुड़ाएँगे नहीं। सच्चे हृदय से निकली हुई प्रार्थना को प्रभु अवश्य सुनते हैं। सबसे बढ़कर प्रभु यह चाहते हैं कि आप चोरी करना, झूठ बोलना, गाली देना, माता-पिता ओर बड़ों की आज्ञा न मानना इत्यादि पापों से मुक्त होकर एक अच्छे बच्चे बने। आप अपने पापों के लिए दु:खी होकर प्रभु से सच्चे हृदय से यह प्रार्थना करें, "हे पवित्र प्रभु, मैं मानता हूँ कि मैं पापी हूँ, मैं विश्वास करता हूँ कि आप मेरे लिए क्रूस पर मारे गए। आज मैं आपको अपना उद्धारकर्ता ग्रहण करता हूँ। मेरे हृदय में आकर निवास कीजिए, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मैं एक अच्छा बच्चा बनूँगा। आप मेरी सहायता करें।"

यदि आप ने सच्चे हृदय से प्रार्थना की है तो निश्चय ही प्रभु यीशु आपको आशिष देंगे और भविष्य में आपकी सहायता करते हुए आपको सफलता भी देंगे। अपने सच्चे मित्र यीशु से प्रार्थना करें। वह आपके निकट है। जब कभी बुरे काम का विचार आपके मन में आए तो आप अपने मित्र यीशु से यों कहें "हे यीशु मुझे इस बुरे कार्य से बचा।" "परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए"। फिर भी लोगों ने इस सच्चे प्रभु को नहीं पहचाना और इस ज्योति को बुझा देने का विचार किया। अन्तत: लोगों ने षड्यंत्र रचकर एक दिन प्रभु यीशु मसीह को पकड़ लिया। उनके सिर पर काँटों का मुकुट रख, उनके मुँह पर थूका, कोड़ों की मार से उनकी पीठ को छलनी कर दिया। यह अत्यन्त मार्मिक घटना है जबकि प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर कीलों से ठोक कर टांग दिया गया। फिर भी प्रभु यीशु मसीह की यह प्रार्थना थी—'हे पिता इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।' इस प्रकार प्रभु यीशु मसीह ने क्रूस पर अपना प्राण देकर हमारे भयानक अनगिनत अपराधों और पापों को अपने ऊपर उठाया। बाइबल कहती है कि "पाप की मजदूरी मृत्यु है।" हमारे पाप व अधर्म के काम तथा हमारे स्वयं के बनाए हुए मार्गों पर चलना आदि कामों के प्रतिफल को उसने अपने उपर उठा लिया। उन्होनें क्रूस पर अपने आपको इसलिए बलिदान किया ताकि मैं और आप अपने पापों के दण्ड से छुटकारा पा सकें तथा अन्धकार से ज्योति में आकर, परमेश्वर के साथ उस संगति को जो पाप के कारण टूट चुकी है, पुन: प्राप्त करें और अन्तत: यीशु मसीह पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आए।" अब, यदि आप यह विश्वास करते हैं की प्रभु यीशु मसीह ने क्रूस पर अपना प्राण इसलिए दिया कि पाप और अन्धकार से मुक्त होकर आप अनन्त जीवन प्राप्त करें तो प्रभु आपके विश्वास के अनुसार आपके पापों को क्षमा करेंगे और आपको सच्ची शान्ति का अनुभव भी देंगे, जो संसार नहीं दे सकता।

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